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लखनऊ सेंट्रल

लखनऊ सेंट्रल

3.2 14004 रेटिंग्स

डायरेक्टर : Ranjit Tiwari

रिलीज़ डेट :

  • मूवी जॉकी रेटिंग्स 2.8/5
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प्लाट

लखनऊ सेंट्रल जेल में सेट एक थ्रिलर है, जिसमें कुछ कैदी मिलकर एक संगीत बैंड की स्थापना के दौरान जेल तोड़ने की योजना बना रहे हैं। फिल्म में फरहान अख्तर, दीपक डोब्रियल, रोनीत रॉय और डायना पेंटी काम कर रहे हैं और ये फिल्म निखिल आडवाणी द्वारा निर्देशित की गयी है !

निर्णय

“ फिल्म थोड़ा भी सरप्राइज नहीं करती लखनऊ सेंट्रल की स्टोरी कमजोर हैं। ”

लखनऊ सेंट्रल क्रेडिट और कास्ट

फरहान अख्तर

लखनऊ सेंट्रल जनता के रिव्यू

लखनऊ सेंट्रल रिव्यू : फरहान अख्तर की इस फिल्म में जेल तोड़ के आज़ाद होने की तीव्र भावना का

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रेटेड 2.5 / 5
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द्वारा Pallavi Jaiswal (189468 डीएम पॉइंट्स) | ऑल यूज़र रिवीव्स

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रिव्यू लखनऊ सेंट्रल & डीएम पॉइंट्स*

फिल्म 'लखनऊ सेंट्राल एक की शुरुआत काफी अच्छी हुई थी। ये कहानी है मुरादाबाद के किशन गिरहोत्रा की जो एक बैंड बनाना चाहता है। छोटे से शहर में रहने वाले किशन को अपने सपने के सच होने की काफी उम्मीद है लेकिन उसे नहीं पता कि उसकी ज़िन्दगी आगे क्या मोड़ लेने वाली है। अलग-अलग तरह से बात करने वाले किशन को एक आईएएस अफसर के क़त्ल के इल्ज़ाम में उम्र कैद हो जाती है। अब आगे क्या होगा यही देखने वाली बात है।

किशन जेल जाकर कुछ साथी कैदियों के साथ बैंड बना लेता है लेकिन उसका मकसद सिर्फ संगीत सीखना और मज़े करना नहीं है। जो वो सोच रहा है वो रिस्की है और उसकी राह में खतरे ही खतरे हैं। इस बंद में 5 लोग हैं - किशन, पंडित, पाली, विक्टर और दिक्कत और इन सभी के पास बाहर निकलने के अपने कारण लेकिन इन सभी के रास्ते में एक आदमी खड़ा है और वो है जेलर श्रीवास्तव (रोनित रॉय)!

ये फिल्म हाल में आयी फिल्म 'क़ैदी बैंड' से काफी मिलती-जुलती है। फ़र्क़ है तो सिर्फ एक्टिंग का! इस फिल्म में फरहान के साथ एक्टर दीपिका डोबरियाल, राजेश शर्मा, गिप्पी ग्रेवाल और इनामुल्लाह हैं, जिनकी वजह से आप फिल्म से बंधे रहते हैं। राईटर्स ने इस फिल्म के किरदारों को असल ज़िन्दगी से जुड़ा दिखाने की काफी कोशिश की है। रोनित रॉय का किरदार आपको ज़्यादा खुश नहीं कर पाता।

स्क्रिप्ट में देखा जाए तो काफी गलतियां भी हैं जैसे कि किरदारों के सरनेम भूल जाना और सही मौके का इंतज़ार करन अलेकिन जब वो आये उसके आज़माना नहीं। जैसे किशन (फरहान) लखनऊ जेल क्यों गया और मुरादाबाद जेल से क्यों नहीं भागा? ऐसी ही कुछ छोटी-बड़ी गलतियों के साथ ये फिल्म दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं।

फिल्म का स्क्रीनप्ले ना जटिल है और न संसक्त। ये एकदम सिंपल फिल्म है जिसमें दर्शकों का ध्यान खींचा जाता है और हमें पता चलता रहता कि आगे क्या होगा। हालांकि फिल्म को पुराने तरीके से बनाया गया है, जहां मरा हुआ हीरो वापस आता है। फिल्म के पहले गाने 'रंगदारी' का मज़ा आगे किसी भी गाने ने नहीं बनाया। रवि किशन और दीपक डोबरियाल ने जहां सभी को हंसाया वहीं बाकि सब ने फिल्म को खराब होने से बचा लिया।

डायना पेंटी का रोल थोड़ा और बेहतर हो सकता था। इसके अलावा ये फिल्म आपको ज़्यादा खुश नहीं करती। अगर आपके पास करने को कुछ नहीं है तो आप ये फिल्म देख सकते हैं !

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