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ऑक्टोबर

ऑक्टोबर

3.0 47655 रेटिंग्स

डायरेक्टर : शूजित सिरकार

रिलीज़ डेट :

  • मूवी जॉकी रेटिंग्स 2.9/5
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प्लाट

फ़िल्म अक्टूबर सुजीत सरकार द्वारा निर्देशित एक रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म है ! फ़िल्म में वरुण धवन के साथ अभिनेत्री के तौर पर बनिता संधू नज़र आएँगी और ये उनकी पहली फ़िल्म होगी ! फ़िल्म की कहानी जूही चतुर्वेदी ने लिखी है और ए.आर रहमान ने इसमें संगीत दिया है ! फ़िल्म 13 अप्रैल 2018 को रिलीज़ होगी !

निर्णय

“वरुण धवन और डायरेक्टर शूजित सिरकार का बढ़िया काम इस फिल्म को धमाकेदार बनाता है !”

ऑक्टोबर क्रेडिट और कास्ट

वरुण धवन

क्रेडिट

कास्ट (क्रेडिट ऑर्डर में)

ऑक्टोबर जनता के रिव्यू

ऑक्टोबर रिव्यू: कुछ कहानियां समझाने लायक नहीं होतीं सिर्फ महसूस की जाती हैं !

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रेटेड 3.5 / 5
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द्वारा Pallavi Jaiswal (189468 डीएम पॉइंट्स) | ऑल यूज़र रिवीव्स

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रिव्यू ऑक्टोबर & डीएम पॉइंट्स*

कुछ कहानियां इंसान को खुश या दुखी करने के लिए नहीं बनी होती हैं। इनका मतलब एक पल की ख़ुशी या ग़म से बहुत ज़्यादा गहरा होता है। हर इंसान की ज़िन्दगी में उसे कई कहानियां सुनने को मिलती हैं। तकरार की, दुःख की, ख़ुशी की और प्यार की। लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता है जब आपको प्यार की नहीं बल्कि प्यार के बारे में कोई कहानी सुनाई जाये।

कभी सोचा है कि इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में बहुत सिंपल चीज़ों को पीछे छोड़ देते हैं हम? हर इंसान को अपने किये के बदले में दूसरे से कुछ चाहिए होता है और अगर वो उसे नहीं मिला, तो उसे किसी बात से फर्क ही नहीं पड़ता। कभी सोचा है कि बिना बदले में कुछ मांगे भी लोगों के लिए कुछ किया जा सकता है? कि ज़िन्दगी में दूसरा आपके लिए कुछ करे या बदले में कुछ दे ये ज़रूरी नहीं होता? प्यार भी नहीं !

इस दुनिया में प्यार के भूखे तो हम सभी होते हैं ना ! लेकिन क्या कभी सोचा है उन लोगों के बारे में जो प्यार में होते हुए भी नहीं होते? जिन्हें सिर्फ उस एक इंसान के साथ रहना और उसका होना पसंद होता है और बदले में कुछ नहीं चाहिए होता। जब आप अपने आप को भुलाकर उस एक इंसान की फ़िक्र करें, जिसे आप ठीक से जानते तक नहीं, जो आपका कुछ भी नहीं लगता है। तब जो फीलिंग आपके दिल में आती है वो किसी को समझा पाना मुश्किल है क्योंकि उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

वरुण धवन की फिल्म 'ऑक्टोबर' इस ही एहसास के बारे में है। एक लड़का, जिसका नाम दानिश वालिया उर्फ़ डैन है, होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा है और दिल्ली के एक बड़े होटल में बतौर ट्रेनी काम भी करता है। उसके साथ उसके दोस्त है और कोर्स के अन्य साथी भी हैं। डैन अड़ियल है, मुंहफट भी है लेकिन दिल का साफ़ है। वो दिनभर में बेशुमार गलतियां करता है लेकिन दूसरों की फ़िक्र भी करता है। शिउली अय्यर, डैन के ही साथ होटल में काम करती है और अपनी समझदारी के चलते छोटी उम्र में ही अपने सीनियर्स के साथ पढ़ाई कर रही है। एक रात हुए हादसे के चलते शिउली लगभग अपनी जान खो देती है। हॉस्पिटल में भर्ती शिउली की ज़िन्दगी आगे कैसी होगी, वो जी भी पायेगी या नहीं? अगर जी गयी तो ज़िन्दगी में कभी उठकर चल-फिर या बात कर भी पायेगी या नहीं, ये कोई नहीं बता सकता। आपको सिर्फ धैर्य रखना है और कहानी को आगे बढ़ते देखना है।

वरुण के किरदार डैन का शिउली से कोई रिश्ता या नाता नहीं है फिर भी वो अपना सबकुछ दांव पर लगाकर उसकी देखभाल में लगा हुआ है। ये फिल्म डैन और शिउली की प्रेम कहानी के बारे में बिल्कुल नहीं है। लेकिन वरुण धवन की आंखों में कुछ है, जो आपको ये चीख-चीखकर बताता कि डैन, शिउली को पसंद करता है और कमाल की बात ये है कि वो उससे बदले में कुछ भी नहीं चाहता। कौन-से ज़माने में सुना था आपने कि दुनिया में ऐसे भी प्यार करने वाले होते हैं, जिन्हें बदले में कुछ चाहिए नहीं होता? वरुण धवन ने इस फिल्म को काफी हद तक अपने कंधों पर चलाया है और 'बदलापुर' के बाद एक बार फिर साबित कर दिया कि वे बॉलीवुड के बेहतरीन एक्टर्स में से एक हैं। डैन के मुंहफट, भोले और फिक्रमंद सभी रूपों को उन्होंने बहुत अच्छे से निभाया है और अंत तक आते-आते आप उनसे प्यार तो ज़रूर करने लगेंगे।

फिल्म की एक्ट्रेस बनिता संधू ने बढ़िया काम किया है। ये उनकी डेब्यू फिल्म है। एक मरीज़ के रूप में आपके पास बहुत डिटेल्स होती हैं, जिन्हें आपको अच्छे से भरना होता है और बनिता ने इस काम को बखूबी किया है। बिना कुछ बोले सिर्फ चेहरे से एक्टिंग करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट में गीतांजलि राव और साहिल वेडोलिया के साथ-साथ बाकि एक्टर्स ने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। एक माँ के रोल में गीतांजलि के इमोशंस और तकलीफ आपके दिल तक पहुंचती है।

डायरेक्टर शूजित सिरकार की जितनी तारीफ की जाये कम है। अक्सर हम सभी कमर्शियल फिल्मों के पीछे भागते हैं। एंटरटेनमेंट के भूखे लोगों को सिर्फ एक एक्शन सीक्वेंस, आइटम नंबर या कॉमेडी से भरी फिल्म चाहिए होती है। लेकिन इन सब के चक्कर में हम सिनेमा का असली मतलब ही कभी-कभी भूल जाते हैं। ऑक्टोबर में कुछ तड़क-भड़क वाली बात नहीं है। ये एकदम सिंपल कहानी वाली फिल्म है, जिसे अगर आप समझने की कोशिश करें ज़िन्दगी की उस गहरायी में जा पहुंचेंगे जहां कुछ सही या गलत नहीं होता और हमेशा कर्म के बदले में आपको फल मिलने की चिंता नहीं करनी होती। आपको सिर्फ धैर्य रखने की ज़रूरत होती है। शूजित ने इस फिल्म को बहुत इत्मीनान से बनाया है, जो साफ़ झलकता है। अगर आप संयम से काम लेंगे तो फिल्म का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जिसे आप मिस करना चाहें।

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर आपके दिल को सुकून देता है और आपको फिल्म से जोड़कर रखते है। इसका श्रेय म्यूजिक कंपोजर शांतनु मोइत्रा और अनुपम रॉय को जाता है, जिन्होंने बढ़िया काम किया है। इस फिल्म के गाने तो रिलीज़ हुए थे, लेकिन फिल्म में एक भी गाना नहीं दिखाया गया है। सिनेमेटोग्राफी की बात की जाए तो फिल्म का हर फ्रेम बढ़िया है। दिल्ली के जितने भी इलाकों में शूटिंग की गयी है सभी को अच्छे से दिखाया गया है। इसके अलावा आपको अन्य जगहें और नेचुरल ब्यूटी भी देखने को मिलेगी। फिल्म की एडिटिंग काफी क्रिस्प है और ये फिल्म 2 घंटों में आपका दिल जीत लेगी।

फिल्म 'ऑक्टोबर' आपको बताती है कि कैसे बिना रोमांटिक मौसम और गिटार की आवाज़ के आपको प्यार हो सकता है। कैसे जिसे आप प्यार करते हैं उसका बला का खूबसूरत होना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि प्यार चेहरे देखकर नहीं होता। और ज़रूरी नहीं है कि जब आप किसी की खुद से ज़्यादा फ़िक्र करें या उसको अपना सारा वक़्त दें तो उस एहसास को प्यार का नाम दिया जाये। मुझे लगता है कि जब आप अपने आप से ज़्यादा किसी और की फ़िक्र करने लग जाते है, तो उस फीलिंग को शब्दों में बता पाना आसान नहीं होता।

अगर आप सिनेमा और ज़िन्दगी की गहरायी को महसूस करना चाहते हैं तो आपको वरुण धवन की फिल्म 'ऑक्टोबर' ज़रूर देखनी चाहिए।

  • Storyline
  • Direction
  • Acting
  • Cinematography
  • Music
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