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इंसान के अंदर छुपे अंधेरे की कहानी है ईशांत खट्टर की फिल्म 'बियॉन्ड द क्लाउड्स'

  • Pallavi Jaiswal

    Pallavi Jaiswal (190068 डीएम पॉइंट्स)

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    3.5
    देसीमार्टीनी | अपडेट - अप्रैल 19, 2018 9:30 बजे IST
    3.0डीएम (26646 रेटिंग्स )

    निर्णय - वर्ल्ड क्लास सिनेमा के प्यार के लिए ये फिल्म ज़रूर देखी जानी चाहिए

    बियॉन्ड द क्लाउड्सट्रेलर देखें रिलीज़ डेट : अप्रैल 20, 2018

    ये जो दुनिया है, जहां हम रहते हैं, यहां सब होता है। इंसान है तो जानवर भी है, भगवान है तो भूत भी… और रौशनी है, तो अंधेरा भी है। मगर जब भी कहानियां कही जाती हैं, तो सिर्फ़ उजाले की कही जाती है या फिर अंधेरे से उजाले के सफ़र की। लेकिन फिर सवाल ये है कि अंधेरे की कहानी कौन कहेगा ?

    फ़िलहाल अंधेरे की कहानी कही है ईरानी फिल्म डायरेक्टर माजिद मजीदी ने और उनकी फिल्म का नाम है ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’, हिंदी में कहें तो- बादलों के पार। हमने कहानियों में देखा-सुना है, बादलों के पार चांद पर परियां रहती हैं। मगर मजीदी की फिल्म ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ एक परी-कथा तो बिल्कुल नहीं है। ये बादलों के पार रहते उन सितारों की कहानी है जो हर पल जल कर राख हो रहे हैं, मगर कहीं न कहीं जिंदगी का एक-आध कतरा उनमें बचा हुआ है। उनमें रौशनी तो है मगर इतनी नहीं कि उसके सहारे जिंदगी चल सके, पौधे सांस ले सकें या इन्सान के एहसासों को गर्मी मिलती रहे। इस टिमटिमाती रौशनी के सहारे उजाले की उम्मीद तो बांधी जा सकती है, मगर ये रौशनी अंधेरे में उलझी हुई है।

    ऐसे ही अंधेरे में उलझा हुआ है ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ का आमिर यानी ईशान खट्टर। आमिर ने 13 साल की उम्र में एक कार एक्सीडेंट में अपने मां-बाप को खो दिया था और उसे पाला तारा ने। आमिर और तारा गरीब हैं। इतने गरीब नहीं कि गरीबी में जान दे दें, लेकिन इतने गरीब कि जल्दी से पैसे कमाकर इस गरीबी से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। और गरीबी को वक़्त से पहले ख़त्म करने का एक ही तरीका है- जुर्म। आमिर, जुर्म के रास्ते चल पड़ता है और इधर से उधर ड्रग्स सप्लाई करता है। तारा उसके इस काम के बिल्कुल खिलाफ है मगर और कोई रास्ता उसके पास भी नहीं, इसलिए बस जब भी आमिर फंसता है तारा उसे बचाती है। इनके मोहल्ले का ही एक और आदमी है अक्षी, जो तारा पर बुरी नज़र रखे हुए है और उसे पता है कि आमिर क्या करता है। अक्षी, तारा को पाना चाहता और उसे पाने के लिए आमिर की करतूतों के बहाने धमकाता है। इसी झड़प में तारा, अक्षी को मार देती है और उसकी हालत गंभीर हो जाती है। हत्या की कोशिश के केस में तारा को गिरफ़्तार कर लिया जाता है। अक्षी ठीक होकर, तारा के पक्ष में बयान दे तो वो बच जाएगी वरना उसे उम्रकैद में रहना पड़ेगा। अब आमिर के सामने एक ही रास्ता है कि वो अपना दुश्मन होने के बावजूद अक्षी को बचाए, ताकि तारा बच सके। अक्षी बचेगा या नहीं यही इस फिल्म की कहानी है। अक्षी के एक गुनाह का ये बादल सिर्फ़ आमिर पर ही नहीं छाया हुआ, बल्कि इसके घेरे में खुद अक्षी की बूढ़ी मां और उसकी दो छोटी-छोटी बच्चियां भी हैं। इस बादल के पार उजाला है या अंधेरा? ये आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा।

    आमिर के रोल में ईशान खट्टर की जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम है। ये ईशान की पहली फ़िल्म है और इसमें वो बिल्कुल मंझे हुए नज़र आ रहे हैं। ईशान का किरदार ‘आमिर’ बेचैन है, महत्वाकांक्षी है, बुरा भी है और फिर भी लुभावना है। इस किरदार को ईशान ने बहुत संजीदगी से जिया है। तारा के रोल में मालविका मोहनन के एक्टिंग भी बहुत शानदार है। जेल के सीन्स में मालविका ने बहुत बेहतरीन एक्टिंग की है। आशा’ और ‘तनिषा’ के किरदार निभा रही बच्चियों ने अपनी उम्र के बहुत बेहतर परफॉर्म किया है। एक नाम जिसका ज़िक्र अलग से किया जाना चाहिए, वो हैं जी वी शारदा। शारदा साउथ इंडियन फिल्मों की वेटरन एक्ट्रेस हैं और तीन बार नेशनल अवार्ड जीत चुकी हैं। ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ में शारदा ने अक्षी की मां ‘पाती’ का किरदार इतना बेहतरीन निभाया है कि उसके बारे में बस एक ही बात कही जा सकती है- अगर दुःख का कोई चेहरा होता है, तो वो ‘पाती’ जैसा होता होगा।

    ‘बियॉन्ड द क्लाउड’ के डायरेक्शन के बारे में बस एक बात कही जा सकती है कि माजिद मजीदी ने इंसानी भावनाओं के वो कोने खोज निकाले हैं जहां तक रौशनी तो पहुंच जाती है, लेकिन जिंदगी नहीं पहुंचती। फिल्म की कहानी की नज़र से देखें तो डायरेक्शन बिलकुल सधा हुआ है। हालांकि ये वो माजिद मजीदी नहीं हैं जिन्हें उनकी खूबसूरत फिल्मों के लिए जाना जाता है। ये माजिद की डार्क फिल्म है।

    फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत खूबसूरत है और कैमरे के ज़रिए मुंबई के ऐसे फ्रेम बनाए गए हैं जैसे आपने शायद पहले न देखे हों। मुंबई में शूट की गई फ़िल्में मरीन ड्राइव और जुहू बीच के बीच ही ख़त्म हो जाती हैं, या फिर धारावी की गलियों में। ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ की कहानी गरीबी से तो ज़रूर है, मगर कहीं भी ऐसा नहीं है कि गरीबी दिखाने के लिए गटर में कूदते बच्चों जैसा भद्दापन दिखाया गया हो जैसा कि ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में था। फिल्म में गाने नहीं हैं, जो कि कहानी को देखते हुए बिल्कुल सही है।

    फ़िल्म में कई कमियां भी हैं जैसे- जब अक्षी का परिवार तमिल बोलता है, तब बहुत बार स्क्रीन पर आपको सबटाइटल नहीं मिलेंगे। एक आध जगह पर फिल्म मेन लॉजिक भी थोड़ा सा कम होता है, लेकिन ये बहुत कम जगह है।

    कुल मिलाकर अगर रेगुलर मसाला फिल्मों और तेज़ भागती फिल्मों से ऊब चुके हैं तो ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ आपको बहुत अच्छा ब्रेक देगी। इस फिल्म को कहानी कहने के अंदाज़ के लिए ज़रूर देखा जाना चाहिए। अगर आप 3 घंटे में पूरा एंटरटेनमेंट लेने हॉल के अन्दर घुसते हैं तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है। हां, अगर सिनेमा प्रेमी हैं और पर्दे पर हर बार बेहतर कहानी देखने की उम्मीद में जाते हैं तो ये फिल्म आप ही के लिए है।