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ऑल यूज़र रिवीव्स ऑफ़ इत्तेफाक

  • इत्तेफाक रिव्यू : सिद्धार्थ और सोनाक्षी से लाइमलाइट छीनकर ले गये अक्षय खन्ना !

    Surabhi Shukla (1260 डीएम पॉइंट्स)

    रेटेड  
    2.5
    देसीमार्टीनी | अपडेट - November 03, 2017 14:00 PM IST
    3.3डीएम (12030 रेटिंग्स )

    निर्णय - निर्णय : थ्रिलर और सस्पेंस में विश्वास रखते हैं तो ये फ़िल्म देखकर आपको अच्छा लगेगे !

    इत्तेफाकट्रेलर देखें रिलीज़ डेट : November 03, 2017



    रिव्यू

    बीआर चोपड़ा के पोते अभय चोपड़ा द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'इत्तेफ़ाक' उनकी डेब्यू फ़िल्म है। इस फ़िल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, सोनाक्षी सिन्हा और अक्षय खन्ना मुख्य किरदार में हैं और इसे रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट द्वारा प्रोड्यूस किया गया है। ये फ़िल्म 1969 में आई यश चोपड़ा की फ़िल्म 'इत्तेफ़ाक' का रीमेक है । हालांकि इसके निर्माताओं का कहना है कि यह पुरानी फिल्म का रीमेक नहीं है बल्कि इसकी कहानी अलग हटकर है। चूंकि इस फ़िल्म के मेकर्स ने ये पहले से तय कर रखा था कि वो इसका प्रमोशन नहीं करेंगे इसलिए लोगों की उत्सुकता इसके प्रति और बढ़ गयी थी।

    यह एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है । फ़िल्म की पूरी कहानी विक्रम सेठी यानी सिद्धार्थ मल्होत्रा और माया यानी सोनाक्षी सिन्हा के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में डबल मर्डर दिखाया गया है जिसमें सिद्धार्थ की पत्नी कैथरीन सेठी और दूसरा लॉयर शेखर सिन्हा जो सोनाक्षी के पति होते हैं उनका मर्डर हो जाता है और इसमें फंसते हैं सोनाक्षी और सिद्धार्थ। दोनों अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए अलग अलग कहानी बुनते हैं लेकिन पुलिस अधिकारी देव की भूमिका में नज़र आये अक्षय खन्ना के सवालों से बच नहीं पाते हैं। दोनों अपनी-अपनी कहानी से यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने यह खून नहीं किया है। उनकी कहानी सच्ची लगती है मगर क्या सच है यही फ़िल्म का मुख्य बिंदु है।

    अभिनय की बात करे तो फ़िल्म में अक्षय खन्ना जोकि एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में नज़र आये उनके अलावा कोई भी दमदार नहीं लगा। अक्षय की आवाज़ उनके किरदार पर फिट बैठ रही हैं और कही कही वो बहुत अच्छे नज़र आये। मगर सिद्धार्थ और सोनाक्षी की एक्टिंग और परफॉरमेंस में कोई ऐसा जादू नहीं था जो दर्शकों को बांधे रखे। हालंकि सिद्धार्थ इसे निभाने की कोशिश करते रहे और कुछ हद तक इसमें सफल भी हुए। बात करे डायरेक्शन की तो कहीं न कही निर्देशक वो सस्पेंस उत्पन्न करने में असफल साबित नज़र आये जिससे कि दर्शकों में उत्सुकता बनी रहे की आगे क्या होने वाला है ?

    फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी माइकल लुका और एडिटिंग नितिन बैड द्वारा की गयी है । फ़िल्म का छायांकन ठीक है और एडिटिंग भी अच्छी की गयी है । सिनेमेटोग्राफी कई जगह ढीली पड़ती नज़र आई। मर्डर वाली जगह और अन्य स्थान पर जिस तरह पुलिस सुबूत इक्कठे करती है उसमें वो बारीकी नहीं दिखी जैसी होनी चाहिए ।

    कुल मिलकर फ़िल्म की कहानी एक डबल मर्डर की है और ये खून एक ही रात में होते हैं। शुरुआत से लेकर अंत तक कहानी आपको एक ही फेज में लेकर जायेगी जहां आप आंख बंद करके कहानी के साथ चलते जायेंगे मगर आखिरी के 15 मिनट में डायरेक्टर ने जो एक ट्विस्ट दिया है वही स्टोरी का मुख्य हिस्सा है। फ़िल्म का क्लाइमेक्स वाकई बेहतरीन है और जब आप सोचेंगे की फ़िल्म का अंत हो गया उस समय ये आपको एक नया एक्सपीरियंस और मिस्ट्री देगी।

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