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ऑल यूज़र रिवीव्स ऑफ़ मुक्काबाज़

  • ये फ़िल्म आपके पास रखे सोने से भी ज़्यादा ख़ालिस है !

    Usha Shrivas (733902 डीएम पॉइंट्स)

    रेटेड  
    3.5
    देसीमार्टीनी | अपडेट - January 11, 2018 09:36 AM IST
    3.1डीएम (2044 रेटिंग्स )

    निर्णय - वन टाइम- टू टाइम नहीं, मल्टीपल टाइम वॉच मूवी है 'मुक्काबाज़' !

    मुक्काबाज़ट्रेलर देखें रिलीज़ डेट : January 12, 2018



    बॉलीवुड के गानों में हमने एक फ्रेज़ बहुत सुना है- 'प्यार में पागल।' अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'मुक्काबाज़' देखने के बाद ये एहसास होता है कि टिपिकल बॉलीवुड लव स्टोरीज़ में हमने 'प्यार' का जो 'पागलपन' अब तक देखा है, वो झूठ था। 'मुक्काबाज़' की कहानी प्यार का असली पागलपन है, एकदम खालिस। यूपी में बुनी ये कहानी उतनी ही देसी है, जितना फिल्म के लीड करैक्टर 'श्रवण' का स्कूटर जिसे वो पूरी फ़िल्म में रगड़ रहे हैं। फिल्म की शुरुआत में जहाँ पहला सीन 'श्रवण' का है, वहीं दूसरा सीन इस स्कूटर का। स्कूटर के स्टेपनी कवर पर मोटा-मोटा लिखा है 'शिक्षित बेरोजगार' और इसके ज़रिए ऑडियंस के लिए ये मेसेज दिया गया है कि 'वेलकम टू उत्तरप्रदेश।' ये अनुराग कश्यप का ट्रेडमार्क शॉट है।

    इस फिल्म की कहानी बरेली के एक उभरते बॉक्सर 'श्रवण' की है। श्रवण बॉक्सिंग का एक बहुत शानदार खिलाड़ी है लेकिन उसे आगे बढ़ने के लिए बस एक बार डिस्ट्रिक्ट लेवल पर खेलने का मौका चाहिए। वो कोचिंग के लिए रोज़ अपने कोच भगवान दास मिश्रा के घर जाता है। भगवान दास बरेली का एक लोकल पॉलिटिशियन है और बॉक्सिंग फेडरेशन का अध्यक्ष भी है। वो बॉक्सर्स को बॉक्सिंग कम सिखाता है और उन्हें अपना 'चेला' बनाकर रखता है। उसकी एक भतीजी है 'सुनैना' जो बोल नहीं सकती। श्रवण को सुनैना से प्यार हो जाता है। भगवन दास अपने यहां बॉक्सिंग सीखने आए लड़कों से घर के काम और गुंडागर्दी करवाता है, बदले में उन लड़कों को खाने पीने को देता रहता है। भगवान दास के इस अरेंजमेंट से बॉक्सिंग सीखने आया श्रवण तंग आ जाता है और भगवान दास से हाथापाई कर बैठता है। भगवान दास कसम खा लेता है कि जब तक वो जिंदा है, श्रवण को कभी आगे नहीं बढ़ने देगा। श्रवण को रोकने के लिए भगवान दास हर तरीके के घटिया से घटिया पैंतरे आजमाने को तैयार है। प्यार की रिंग में भगवान दास की पॉलिटिक्स जीतेगी या श्रवण की मुक्केबाजी ? यही फिल्म की स्टोरी है।

    फ़िल्म में 'कास्ट-वॉर' और 'बीफ़ पॉलिटिक्स' के एंगल को बेहतरीन तरीके से फ़िल्माया गया है। फ़िल्म की पूरी कास्ट का किसी न किसी तरह से उत्तरप्रदेश से नाता रहा है, इसलिए सभी एक्टर्स यूपी की पॉलिटिक्स और कास्ट इक्वेशन को ईमानदारी से जीते हुए दिखते हैं। कास्ट-वॉर के एंगल से जिमी शेरगिल के करैक्टर 'भगवान दास मिश्रा' और और रवि किशन के करैक्टर 'संजीव कुमार' के बीच एक बहुत बेहतरीन कन्वर्सेशन है:

    भगवान दास- 'क्या नाम है तुम्हारा ?'

    संजीव- 'जी, संजीव कुमार।'

    भगवान दास- 'संजीव कुमार, आगे क्या ?'

    संजीव- 'बस संजीव कुमार।'

    भगवान दास- 'अरे मने, ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो कि वैश्य हो ?'

    संजीव- 'जी वही जात, वही जिसका नाम नाम तक आपसे नहीं लिया जाता!'

    फ़िल्म में कास्ट-वॉर के एक नहीं, दो पहलू हैं। जहां छोटी कास्ट का होने की वजह से संजीव को भगवान दास से बेज़्ज़ती झेलनी पड़ती है, वहीं फ़िल्म के मुख्य किरदार 'श्रवण' को रेलवे की नौकरी के दौरान अपनी ऊंची कास्ट की वजह से परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्रवण का सीनियर उससे चपरासी वाले काम कराता है और श्रवण की, अपने से ऊँची, कास्ट पर ताना मारते हुए कहता है- 'मेरे पिताजी भूमिहारों के यहां नौकर थे। वक़्त कितनी जल्दी बदलता है न।'

    डायरेक्शन: अनुराग कश्यप का डायरेक्शन किसी इंट्रो का मोहताज नहीं है। लेकिन इस बार अनुराग ने खुद को 'टोन-डाउन' किया है और फिल्म को वायलेंस और गालियों से दूर रखा है। अनुराग ने ऐसा शायद फिल्म की थीम की वजह से किया है या फिर ये फिल्म की रीच बढ़ाने के लिए किया गया फैसला है। अनुराग के काम में बारीकियां बहुत रहती हैं जो इस बार भी खूब हैं। किरदारों के घरों के रंग हों या उनके दरवाज़े या फिर किरदारों के कपड़े, हर चीज़ पर अनुराग की स्टैम्प है। कहानी की स्पीड की बात करें तो इंटरवल से पहले कहानी कहीं- कहीं खींचती नज़र आई।

    गाने- गानों के लिरिक्स कहानी को फ़्लेवर देने वाले हैं और कहानी के मूड को बहुत अच्छे से सेट करते हैं। हुसैन हैदरी और विनीत कुमार सिंह के लिखे लिरिक्स दिल को छूते भी है और जुर ज़ुबान पर भी तुरंत चढ़ते हैं। रचिता अरोड़ा का म्यूजिक और 'बहुत दुखा मन' गाने में खुद उनकी आवाज़ बेहद शानदार है। हालांकि अगर पूरी म्यूजिक एल्बम को देखें तो ऐसा लगता है कि 'गैंग्सऑफ़ वासेपुर' को दोहराने की कोशिश हुई है।

    एक्टिंग: ट्रेलर रिलीज़ होने के साथ ही लीड एक्टर विनीत कुमार सिंह की मेहनत और उनकी मेथड एक्टिंग की तारीफ़ होने लगी थी। लेकिन विनीत के सामने 'सुनैना' के रोल में ज़ोया हुसैन की भी तारीफ होनी चाहिए। उन्होंने इस फिल्म के लिए बाकायदा 'साइन लैंग्वेज' सीखी है। 'भगवान दास' के नेगेटिव रोल में जिमी शेरगिल बिलकुल उतने घिनौने लगे हैं जितना इस देसी लव स्टोरी के विलेन को लगना चाहिए था। रवि किशन एक बार फिर से छोटे से रोल में अपनी अच्छी छाप छोड़ते हैं।

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  • Usha Shrivas

    Usha Shrivas

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    रेटेड 3.5जनवरी 11, 2018

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