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दोस्ती और शादी के चक्कर में कहानी पीछे रह गयी !

  • Pallavi Jaiswal

    Pallavi Jaiswal (189468 डीएम पॉइंट्स)

    रेटेड  
    1.5
    देसीमार्टीनी | अपडेट - जून 01, 2018 2:11 बजे IST
    2.8डीएम (30920 रेटिंग्स )

    निर्णय - फ्रेंडशिप गोल्स और मस्ती से भरी इस फिल्म में करीना का कमबैक फीका पड़ गया !

    वीरे दी वेडिंग रिलीज़ डेट : जून 01, 2018

    दुनिया में दोस्ती सबसे बड़ी चीज़ है और हम सभी ने बॉलीवुड में कई बढ़िया दोस्ती पर बनी फ़िल्में भी देखी हैं? तो फिर फिल्म 'वीरे दी वेडिंग' में क्या ख़ास है? इसका जवाब है बहुत कुछ और कुछ-कुछ नहीं भी। ये कहानी है चार लड़कियों की जो स्कूल के समय की जिगरी दोस्त हैं। सभी के अपने बड़े-बड़े सपने हैं और अपनी-अपनी प्रॉब्लम्स। कालिंदी, अवनि, साक्षी और मीरा बड़ी होने के बाद अपनी ज़िन्दगियों में व्यस्त तो हैं लेकिन कुछ ख़ास खुश नहीं हैं। ऐसे में कालिंदी के बॉयफ्रेंड का उसे प्रपोज़ करना और कालिंदी का शादी के लिए हां बोल देना सभी दोस्तों को एक बार फिर साथ लाता है। लेकिन कालिंदी के ख्याल और एक्सपीरियंस शादी के मामले में बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। ऐसे में क्या ये शादी टिक पायेगा? या हो भी पायेगी?

    कालिंदी यानी करीना कपूर ने बचपन से ही अपने माता-पिता को लड़ते-झगड़ते देखा है। उसकी माँ के गुज़रने के बाद अब कालिंदी ऑस्ट्रेलिया में रहती है और उसके पिता से उसके रिश्ते अच्छे नहीं है। ऐसे में उसका एक सहारा उसके चाचा और दोस्त हैं। अवनि यानी सोनम कपूर एक डिवोर्स लॉयर हैं और अपनी माँ की शादी की रट से परेशान हैं। साक्षी यानी स्वारा भास्कर नशे में डूबी रहने वाली लड़की है, जो अपने पति से परेशान होकर उससे तलाक ले रही है। मीरा यानी शिखा तलसानिया अमेरिका में अपने पति के साथ रह रही है। उसके घरवाले अँगरेज़ से भागकर शादी करने की वजह से उससे नाराज़ हैं। कालिंदी (करीना) का बॉयफ्रेंड ऋषभ (सुमीत व्यास) उसे शादी के लिए पूछता है और वो हाँ बोल देती है। इसके बाद शुरू होता है सियाप्पा !

    एक्टिंग की बात करें तो करीना कपूर का दो साल बाद हुआ कमबैक बिल्कुल फीका था। सोनम कपूर और स्वारा भास्कर ने बढ़िया काम किया है और शिखा तलसानिया ने अपने रोल को बखूबी निभाया है। लेकिन इस फिल्म की कहानी काफी खराब है। आपको एक सीन और भावना को ठीक से महसूस करने का समय नहीं मिलता और कहानी यहां से वहां बहुत रफ़्तार में जाती है। चार लड़कियों की दोस्ती बहुत बढ़िया है लेकिन इसे दिखाने का तरीका काफी खराब था।

    डायरेक्टर शशांक घोष ने इस फिल्म को 'कूल' बनाने के चक्कर में कई चीज़ों को लात मार दी। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी जहां अच्छी थीं वहीं फिल्म की एडिटिंग काफी खराब हुई है। एक सीन पूरा होने से पहले ही कुछ अलग और नया आ जाता है और अंत तक आते-आते आप बोर होने लगते हैं और दुआ करते हैं कि ये फिल्म खत्म हो जाये बस। ढंग की एंडिंग के चक्कर में फिल्म को जो रबड़ बनाया गया है, उसका तो मत ही पूछो।