इम्तियाज़ अली ने जिसे 'मजनूं' बनाया है, वो अविनाश तिवारी असल में पागल है !

कहते हैं मोहब्बत और पागलपन में बस रत्ती भर का फर्क होता है। जहां ये फर्क मिल जाता है, वहां आदमी मजनूं बन जाता है। मजनूं वो, जिसे हमारे यहां सबसे बड़े आशिकों, दीवानों में शुमार किया जाता है। मजनूं, कभी एक आदमी था, आज एक मुहावरा है। इश्क में पड़े आदमी को लोग अक्सर मजनूं कह देते हैं। प्यार के इंतज़ार में राहें तकने वाला- मजनूं, महबूबा की एक झलक के लिए रातों-रात खिड़की पर टकटकी लगाने वाला- मजनूं, और प्यार के पागलपन में हाथ की नस काट लेने वाला- मजनूं।

लेकिन मजनूं का मुहावरा बन जाना आसान है, मजनूं हो जाना मुश्किल। बेहद मुश्किल। इसलिए अगर कोई सिनेमा की स्क्रीन पर मजनूं को सही से जी जाए, तो वो यकीनन पागल है। और मैं पूरे यकीनी तौर से कह रहा हूं- अविनाश तिवारी पागल है। 

 -

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, ये जानने के लिए आपको 7 सितम्बर को रिलीज़ हुई फिल्म ‘लैला-मजनूं’ देखनी होगी। ये फिल्म हर किसी को पसंद नहीं आने वाली। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि जिस फिल्म के लीड एक्टर को मैं पागल कह रहा हूं, उसे लिखा है इम्तियाज़ अली ने अपने भाई साजिद अली के साथ। इम्तियाज़ अली वही, जिसने ‘जब वी मेट’, ‘लव आजकल’ और ‘रॉकस्टार’ जैसी फ़िल्में बनाई हैं। वो वैसे भी पहुंचा हुआ आदमी है। ऐसे लोग और उनकी कहानियां किसी की समझ में आती कहां हैं। लेकिन इम्तियाज़ की बात फिर कभी, फिलहाल अविनाश तिवारी।

 -

एक आदमी है, जो बादलों में स्याही डुबाकर लिखता है, गुलज़ार नाम है उसका। उसने पूछा था एक बार- ‘आखिर किसलिए ये खेल ? मन नहीं ऊबता ?’ मैं आज कहता हूं- नहीं ऊबा। और इसकी वजह है अविनाश तिवारी। दिल्ली की बेशऊर बारिशों की बदतमीज़ी से लड़ते-जूझते आप सिनेमा हॉल में घुसते हैं, 35 मिनट की फिल्म बीत चुकी है। मगर सीट पर बैठते ही, स्क्रीन पर मौजूद शख्स आपको बाँध लेता है। उसकी प्रेमिका कह रही है, ‘सच कहते हैं लोग, तू पागल है !’ चूँकि आप लेट हैं, शुरुआत की फिल्म छोड़ चुके हैं, आप नहीं समझ पाते कि वो ऐसा क्यों कह रही है। 

 -

मगर स्क्रीन पर वो जो अविनाश तिवारी है, कैस के किरदार में, वो आपकी बेचैनी समझ जाता है। और कहता है, अच्छा बैठो ! मैं बताता हूं, उसके ऐसा कहने की वजह। और फिल्म ख़त्म होने पर आप सुन्न बैठे रहते हैं। ऐसा नहीं था कि मुझे लैला-मजनूं की कहानी पहले नहीं पता थी। पता थी, मगर फिल्म थी, तो ये देखना था कि जो कहानी मुझे पता है, क्या उसे, उसी तरह पर्दे पर जिया जा सकता है ? बार-बार सुने/पढ़े/देखे जा चुके लैला-मजनूं के खेल से क्या इस बार जी नहीं ऊबेगा ? कैस बने अविनाश तिवारी ने नहीं ऊबने दिया। ये आदमी आँखों में जाने कहां से ऐसी चमक लाया है ! 

 -

जब लैला के प्यार में होता है तो इसकी आँखों में जुगनू टिमटिमाते हैं। और लैला के बिछोह में, इसकी आँखों का नमक। वो जब कैस से मजनूं हो जाता है तो उसकी आंखें जंगलों में आग लगा देती हैं। उस आग की रौशनी में लैला-लैला पुकारते मजनूं की आँखों का नमक, ऐसा चमकता है कि हॉल में बैठे आदमी की आँखों में चौंध लगती है। कभी पानी भी आ जाता है आँखों से, मगर अविनाश तिवारी की आँखों में जो नमक था न, और जो चमक थी... मैं कहता हूं फिर से, यकीन कीजिए- अविनाश तिवारी पागल है।