'छोरी' रिव्यू: नुशरत भरूचा की हॉरर फ़िल्म डराने का हल्ला तो करती है, मगर डराती नहीं!

    'छोरी' रिव्यू: नुशरत भरूचा की हॉरर फ़िल्म डराने का हल्ला तो करती है, मगर डराती नहीं!

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    'छोरी' रिव्यू: नुशरत की फ़िल्म डराने का हल्ला तो करती है, मगर डराती नहीं!
    'छोरी' रिव्यू: नुशरत भरूचा की हॉरर फ़िल्म डराने का हल्ला तो करती है, मगर डराती नहीं!
    Updated : November 26, 2021 03:52 PM IST

    हॉरर फिल्मों में 'समाज के नाम संदेश' देने की जो लत है न, इसी ने बॉलीवुड की कई सारी हॉरर फिल्म्स के पेंच ढीले किए हैं। कन्या भ्रूण हत्या हमारे देश में यकीनन बहुत बड़ी समस्या रही है और ये वाकई बहुत घिनौना अपराध है। लेकिन इसे लेकर जागरूकता फैलाने का काम, इन हॉरर फिल्मों के मुकाबले सरकारी ऐड ज़्यादा अच्छा कर लेते हैं!

    'छोरी' बॉलीवुड से निकली एक और टिपिकल हॉरर फिल्म है जिसपर 'सोशल मैसेज' का ठप्पा बहुत गाढ़ा लगा है। कहानी में वही बॉलीवुड टेम्पलेट है जिसे देखकर आप 'ये क्या बेवकूफी है?' बोलते रह जाते हैं।

    फ़िल्म के पहले 15 मिनट में कहानी ये घटती है कि साक्षी एक 8 महीने प्रेग्नेंट महिला हैं। उनके पति हेमंत ने कभी बिज़नेस के लिए कोई लोन लिया था, जो चुका नहीं पाया। एक बार वसूली भाइयों से पिटने और 24 घण्टे में लोन चुकाने की वार्निंग के बाद वो आईडिया लगाता है कि किसी ऐसी जगह जा के छिप जाते हैं जहां तक कोई न पहुंच सके। तो इनका ड्राइवर इन्हें अपने गांव में छुपा लेता है। उसका एक घर है गन्ने के खेतों के बीचोंबीच। वहीं साक्षी और हेमंत रहने लगते हैं, और ड्राइवर के साथ उसकी वाइफ इनकी सेवा में लग जाती है। और बीवी को एक अनजान जगह छोड़ के पूरी फिल्म के लिए कहीं चाय-मट्ठी खाने चला गया है!

    मामला भूतिया तब होता है जब साक्षी को कुछ खेलते हुए बालक दिखते हैं। लेकिन एक्चुअली, वो हैं नहीं। क्योंकि ऑफकोर्स, भूतिया फ़िल्म है न! और ये सब अपने आप नहीं होता, दरअसल अगर साक्षी जैसे लोगों को इनके पेरेंट्स बचपन में सिखा देते कि अनजान जगह हाथ नहीं देना होता, तो हमें ऐसी हॉरर फिल्में न झेलनी पड़तीं।

    प्रॉब्लम ये है कि 'छोरी' की कहानी में बेदिमाग एलिमेंट्स ज़्यादा हैं। फ़िल्म की जनरल पेस भी स्लो है। डर का फील लाने के लिए लंबे-लंबे कई शॉट्स हैं, जो थोड़ी देर के बाद बोरिंग लगने लगते हैं। और डराने के लिए म्यूजिक का सहारा बहुत ज़्यादा लिया गया है।

    नुशरत ने अपने करियर में ये एक फ़िल्म की है जिसमें उनकी एक्टिंग पर मेहनत नज़र आती है। फ़िल्म की लीड के तौर पर वो स्टोरी में काफी इनवेस्टेड नज़र आती हैं। लेकिन वैसे मज़बूत एक्टर माने गए राजेश जैस और मीता वशिष्ठ का एक्सेंट बहुत डिस्टरबिंग है और एक समय बाद इरिटेट करने लगता है। फ़िल्म में कन्या भ्रूण हत्या पर एक ज़रूरी मैसेज तो है, मगर इस मैसेज को रखने के लिए फ़िल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले में एक ज़बरदस्ती की कोशिश की हुई लगती है। ये हॉरर के साथ सहज ही आपके मन पर नहीं लगता।

    डायरेक्टर विशाल फुरिया ने अपनी ही मराठी फिल्म 'लपाछपी' पर ये हिंदी रीमेक बनाया है। ओरिजिनल फ़िल्म कैसी है पता नहीं, मगर 'छोरी' को एक औसत बॉलीवुड हॉरर फिल्म की कैटेगरी में पटका जा सकता है।



    Updated: November 26, 2021 03:52 PM IST
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