'बधाई दो' रिव्यू: राजकुमार राव, भूमि पेडनेकर का क्वीयर रोमांस पिछली फिल्मों से ज्यादा सुंदर और कम दिक्कत भरा है!

    'बधाई दो' रिव्यू: राजकुमार राव, भूमि पेडनेकर का क्वीयर रोमांस पिछली फिल्मों से ज्यादा सुंदर और कम दिक्कत भरा है!

    3.5

    बधाई दो

    अपने परिवारों से अपनी क्वीयर पहचान छिपा रहे शार्दुल और सुमन 'लैवेंडर मैरिज' का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या इससे उनकी दिक्कतें ख़त्म हो जाएंगी?

    Director :
    • हर्षवर्धन कुलकर्णी
    Cast :
    • राजकुमार राव,
    • भूमि पेडनेकर,
    • चुम दरांग,
    • शीबा चड्ढा
    Genre :
    • सोशल कॉमेडी
    Language :
    • हिंदी
    'बधाई दो' रिव्यू: राजकुमार राव, भूमि पेडनेकर का क्वीयर रोमांस पिछली फिल्मों से ज्यादा सुंदर और कम दिक्कत भरा है!
    Updated : February 11, 2022 08:57 PM IST

    क्वीयर किरदारों की कहानी, उनके संघर्ष और उन्हें अभी तक न मिले अधिकारों को लेकर हिंदी कंटेंट पिछले कुछ सालों में सही लाइन पकड़ने की काफी कोशिश कर रहा है। लेकिन पॉपुलर फिल्मों में उनका रिप्रेजेंटेशन कहीं न कहीं (और कई बार तो पूरी फिल्म में) गड़बड़ा ही जाता है। 

    आयुष्मान खुराना की ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ और पिछले महीने ही रिलीज़ हुई ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ ने मास-एंटरटेनर के लेवल इस टॉपिक को उठाया तो ज़रूर, लेकिन इन फिल्मों में कुछेक सीन थोड़े खटके। राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर की फिल्म कम से कम क्वीयर रोमांस सोचकर ही उल्टियां करने वालों लोगों को स्क्रीन पर नहीं दिखाती और इसके लिए तो भई डायरेक्टर हर्षवर्धन कुलकर्णी को ‘बधाई दो’!

    ‘बधाई दो’ ने अपने कंटेंट में रस्सी पर चलने वाला करतब किया है और इसमें बॉलीवुड का टिपिकल होमो-एटिट्यूड तो नहीं ही दिखाई देता। पहले सीन में उबासी से शुरू हुई ये फिल्म फर्स्ट हाफ़ में स्लो ज़रूर लगती है, लेकिन सेकंड हाफ़ देखने के बाद आपको समझ आएगा कि असल में डायरेक्टर ने अपनी स्टोरी को बैलेंस करने में पूरा टाइम लिया है। मैंने क्वीयर स्टोरीज़ पर बनने वाली फिल्मों को जज करने के लिए एक चेकलिस्ट बनाई है। 

    पहला पॉइंट ये कि क्या फिल्म में क्वीयर किरदार स्टीरियोटिपिकल हैं? ‘बधाई दो’ में ऐसा नहीं है। दूसरा, क्या कैरेक्टर की जेंडर आइडेंटिटी सिर्फ ड्रामा और टेंशन क्रिएट करने के लिए है और इसे एक्स्प्लोर करने से बचा गया है? जवाब है- नहीं। और तीसरा, क्या क्वीयर-आइडेंटिटी से जुड़े स्टिग्मा को फिल्म में सस्ती-मस्ती के लिए इस्तेमाल किया गया है? मोटे तौर पर इसका जवाब भी ‘नहीं’ ही है।

    प्लॉट ये है कि राजकुमार राव एक गे पुलिसवाले हैं और एक केस के चक्कर में लेस्बियन पीटी टीचर भूमि पेडनेकर से मिलते हैं। दोनों के जीवन में एक नॉर्मल शादी करने का प्रेशर बहुत ज़ोरदार है क्योंकि दोनों ने ही अपने परिवार के सामने अपनी जेंडर आइडेंटिटी नहीं रखी है। इस दबाव से निकलने के लिए दोनों तय करते हैं कि चलो शादी कर लेते हैं- समाज और परिवार भी खुश, और साथ में हम अपनी-अपनी दूसरी ज़िन्दगी भी आराम से जी सकेंगे। यानी लैवेंडर मैरिज जिसमें अलग-अलग सेक्स के, अलग-अलग जेंडर वाले लोग शादी कर लेते हैं। (अब सेक्स और जेंडर में क्या अंतर है ये न पता हो तो प्लीज़ गूगल करें!) 

    ट्रेडिशनल सिस्टम को तोड़ने से डरने वाले दोनों ये नहीं सोचते कि शादी अपने आप में खुद एक बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब निकालने में पसीने छूट जाते हैं। और फिर यही होता भी है। और घरवाले बच्चा करने के लिए प्रेशर बनाना शुरू कर देते हैं। फिल्म में राव की अपनी गे लव स्टोरी भी है और भूमि की अपनी लेस्बियन लव स्टोरी भी। 

    हालांकि, ट्रेलर में सिर्फ भूमि और चुम दरांग की लव स्टोरी ही थी। ‘बधाई दो’ का ट्रेलर देखने के बाद एक चिंता ये भी थी कि क्या ये फिल्म ‘लैवेंडर मैरिज’ को प्रोमोट करती है? तो इसका जवाब भी है- नहीं। क्योंकि अंत में दोनों के कैरेक्टर्स ये क्लियर कर देते हैं कि चूंकि क़ानूनी रूप से भारत में सेम-सेक्स अभी वैलिड नहीं है, इसलिए ‘लैवेंडर मैरिज’ करना उनकी मजबूरी है। 

    ये मज़बूरी क्यों है, इसके लिए दोनों किरदारों के पास अपने-अपने कारण हैं। लेकिन मेरी दिक्कत ये है कि राजकुमार राव का किरदार अपना केस उतना दमदार नहीं रख पाता। हालांकि, भूमि के कारण को लेकर भी एक अलग डिबेट हो सकती है क्योंकि वो और ज्यादा इमोशनल है, लेकिन उसमें अपनी दिक्कतें हैं। 

    फिल्म का मुख्य मकसद ये दिखाना ही लगता है कि परिवारों में अस्वीकार्यता और समाज का नफरती रवैया कैसे क्वीयर लोगों को को उनके सामान्य मानवीय अधिकारों और कुछ सामान्य इच्छाओं को पूरा करने से दूर रखता है। लेकिन कॉमेडी बनाने के लिए फिल्म ने कुछ और चीज़ों से समझौता कर लिया। जैसे कि एडॉप्शन और इनफर्टिलिटी को लेकर फिल्म के लीड कैरेक्टर्स का नजरिया सेंसिटिव नहीं लगा। और साथ में फिल्म के सपोर्टिंग कैरेक्टर्स बॉडी शेमिंग और हलके मैरिज जोक्स को ठेलते भी दिखे। 

    फिल्म अगर एक सेंसिटिव टॉपिक से डील कर रही है तो इसका मतलब ये नहीं होना चाहिए कि बाकी चीज़ों को हलके में ले ले। लेकिन फिर भी अगर आप होमो-फोबिक नहीं हैं और बेसिक सेंसिटिविटी रखते हैं तो फिल्म में आपको दिलचस्पी तो लगेगी। ‘बधाई दो’ की सबसे बड़ी खासियत ये है कि सेम-सेक्स रोमांस को कैमरा, कलर्स और म्यूजिक बहुत खूबसूरती से दिखाता है। 

    अगर आपको सेम-सेक्स वाले किस सीन करंट देते हैं तो भी टेंशन न लें, बिना इनके ही फिल्म में रोमांस का लेवल बहुत खूबसूरत है। ‘हम थे सीधे-सादे’ और ‘मांगें मंजूरियां’ तो खूबसूरत हैं ही और इनको बुत प्यारा फिल्माया गया है। लेकिन ‘हम रंग हैं’ तो एक अलग ही लेवल पर है और वीडियो रिलीज़ होने के बाद पक्का नया क्वीयर एंथम बन जाएगा। वरुण ग्रोवर, अनुराग भोमिया और अज़ीम शिराज़ी के लिरिक्स के साथ अमित त्रिवेदी का म्यूजिक शानदार है। 

    सिनेमेटोग्राफी सुन्दर है और साउंड डिजाईन खासतौर पर ध्यान देने लायक है। और एक्टिंग की बात करें तो राजकुमार राव की एनर्जी, उनका ठहराव और ट्रांस्फोर्मेशन देखने लायक है। भूमि पेडनेकर का काम भी आपको एक बार फिर से इम्प्रेस करेगा। दोनों की परफॉरमेंस उनके करियर की बेस्ट में गिनी जाएंगी। चुम दरांग की स्क्रीन प्रेजेंस देखकर आपकी नज़रें अटक जाएंगी और साथ में फिल्म का एक ख़ास स्पेशल अपीयरेंस भी दिल जीत लेगा। शीबा चड्ढा का अलग से नाम लेना ज़रूरी है क्योंकि वो फिल्म में बहुत कम बोली हैं, लेकिन उनके एक्सप्रेशन देखकर ही थिएटर्स में हल्ला हो जाएगा।

    कुल मिलाकर ‘बधाई दो’ में अपनी दिक्कतें हैं लेकिन ये हिंदी फिल्मों की कुछ बहुत चर्चित क्वीयर स्टोरीज़ से काफी बेहतर लगेगी, और दिमाग के ताले खोलने के साथ-साथ दिल को भी नरम करेगी।