‘द विसलब्लोअर’ रिव्यू: ऋत्विक और रवि किशन की सॉलिड परफॉरमेंस के बावजूद ढीला स्क्रीनप्ले करता है बोर!

    ‘द विसलब्लोअर’ रिव्यू: ऋत्विक और रवि किशन की सॉलिड परफॉरमेंस के बावजूद ढीला स्क्रीनप्ले करता है बोर!

    2.0

    द विसलब्लोअर

    सोनी लिव (2021)

    कास्ट: ऋत्विक भौमिक, रवि किशन, आशीष वर्मा, सोनाली कुलकर्णी और सचिन खेडेकर

    नामी मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट घोटाले, व्यापम से प्रेरित बताई जा रही ये सीरीज इस घोटाले के पूरे सिस्टम की हकीकत को बेबाकी से सामने रखती है।

    ‘द विसलब्लोअर’ रिव्यू: ऋत्विक और रवि किशन की सॉलिड परफॉरमेंस के बावजूद ढीला स्क्रीनप्ले करता है बोर!
    Updated : December 17, 2021 08:05 PM IST

    सबसे पहली बात तो ये कि कोई रवि किशन के लिए बहुत भौकाली सा सुपर रोल लिखो भाई। ये आदमी एक से एक धांसू परफॉरमेंस दिए जा रहा है और स्क्रीन पर आग लगा रहा है। और साथ में ऋत्विक भौमिक जिसने ‘बंदिश बैंडिट्स’ जैसी टॉप मार्का परफॉरमेंस दी है, एक बार फिर टॉप फॉर्म में हैं। व्यापम स्कैम से इंस्पायर्ड बताई जा रहे सोनी लिव के इस शो में ‘स्कैम 1992’ की सक्सेस दोहराने वाला सारा कच्चा माल मौजूद था। मगर क्या ऐसा हुआ?

    जवाब है नहीं। बल्कि हुआ इसका ठीक उलटा। ये शो जितना एंगेजिंग हो सकता था, उतना ही बोरिंग हो गया। और इसका एकमात्र दुश्मन है ख़राब स्क्रीनप्ले। मेडिकल एडमिशन की सीट्स में घोटाला एक बहुत हॉट टॉपिक है। आए दिन न्यूज़ आती रहती है कि फलाने मेडिकल एंट्रेंस में पकडे गए इतने मुन्नाभाई। 

    डॉक्टर बनने की गारंटी पर किडनी बेच के पैसा जुगाड़ने को तैयार, इंडियन मिडल क्लास के सपनों ने कितनी बड़ी मार्किट तैयार कर रखी है, इसे स्क्रीन पर कौन नहीं देखना चाहेगा। साथ में ऋत्विक भौमिक, रवि किशन, आशीष वर्मा, सोनाली कुलकर्णी और सचिन खेडेकर जैसे वजनदार एक्टर्स। सोनी लिव के इस शो को ‘स्कैम 1992’ जैसा धमाकेदार बनने के लिए बस एक चीज़ और चाहिए थी- कायदे की राइटिंग। बस वही नहीं हुआ!

    लेकिन फिर भी कमाल देखिए, पेपर लीक का ये पूरा मैकेनिज्म, इसे चलाने वाली मशीनरी, अपने पदों से ही नहीं, अपनी नैतिकता से भी भ्रष्ट हो चुके ऑफिशियल। और एक लीड कैरेक्टर जो आधे शो में तो सिर्फ साइड में खडा सब देख रहा है, आपकी दिलचस्पी जगाए रहते हैं। हालांकि, शो में समस्या भी यही है। 

    जनता के सामने ये पूरा ड्रामा संकेत (ऋत्विक) की नज़रों से आ रहा है जबकि वो खुद पहले 4 एपिसोड तक सिर्फ इस पूरे तमाशे से बेफिक्र जी रहा है। इस लीड कैरेक्टर की मोटिवेशन इसके एम्बिशन सबकुछ इतना गड्ड-मड्ड है कि यकीन से परे का मामला हो जाता है। पांचवे एपिसोड तक आते-आते सीन ऐसा था कि मैं अपने मन में, स्क्रीन पर जो न होने की दुआ मांग रहा था, शो में बस वही हो रहा था। ये प्रेडिक्टेबल होने की इंतेहा है।

    फिर भी अगर 50-50 मिनट के एपिसोड्स में, चलते हुए लोगों को एक किलोमीटर दूर से ही आते हुए देखने की हिम्मत है तो ‘द विसलब्लोअर’ में आपको मेडिकल एंट्रेंस घोटालों में चलने वाली ट्रिक्स, और पूरे मैकेनिज्म के बारे में अच्छी जानकार मिल सकती है। डायरेक्टर मनोज पिल्लई का ये शो रिसर्च के मामले में पूरा क्रेडिट डिज़र्व करता है।