'धमाका' रिव्यू: कार्तिक आर्यन की ये नेटफ्लिक्स फ़िल्म न्यूज़ चैनल्स के तमाशे की एक-एक सिलाई उधेड़ती है!

    'धमाका' रिव्यू: कार्तिक आर्यन की ये नेटफ्लिक्स फ़िल्म न्यूज़ चैनल्स के तमाशे की एक-एक सिलाई उधेड़ती है!

    4.0
    'धमाका' रिव्यू: कार्तिक की ये फ़िल्म न्यूज़ चैनल्स के तमाशे की सिलाई उधेड़ती है
    'धमाका' रिव्यू: कार्तिक आर्यन की ये नेटफ्लिक्स फ़िल्म न्यूज़ चैनल्स के तमाशे की एक-एक सिलाई उधेड़ती है!
    Updated : November 19, 2021 06:21 PM IST

    कार्तिक आर्यन की अभी तक की फ़िल्मों के हिसाब से उनकी इमेज एक ऐसे ही सस्ती मस्ती में रहने वाले लौंडे की है। 'पति पत्नी और वो' में वो भले एक शादीशुदा आदमी के रोल में थे, लेकिन उस आदमी का गोल भी लौंडापन ही था! लेकिन अब आपको कार्तिक के नाम से 'धमाका' याद आएगी।

    नेटफ्लिक्स की 'धमाका' एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देखने के बाद आपकी सोच में विस्फोट होगा। हम लोग उस दौर में जी रहे हैं जहां हमारे चारों तरफ बहुत ज़्यादा शोर है,विवादों की एक टेंशन सी हमेशा बनी रहती है। ये शोर पहले ट्विटर फेसबुक व्हाट्सएप पर तो था ही लेकिन अब आप इसे चाय के अड्डों, ट्रेनों और बसों में लोगों की बातचीत में भी सुन सकते हैं। और इस शोर का एक बड़ा ऑरिजिन है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टीवी न्यूज। 'धमाका' आपको इस मीडियम के उस पार ले जाती है, उस फैक्ट्री में जहां ये शोर तैयार किया जाता है, और आपको बेचा जाता है। अब आप सोच सकते हैं कि आपने ये खरीदा कब! ये समझने के लिए आपको 'धमाका' देखनी चाहिए।

    फ़िल्म का सबसे बेसिक काम आपके दिमाग पर एक असर क्रिएट करना होता है। ये असर रिलीफ भी लग सकता है, एंटरटेनमेंट भी, सवाल भी और किसी सवाल का जवाब भी और कभी-कभी एक मोटिवेशन भी। कोई फ़िल्म कैसी है ये मोटे तौर पर दो बातों से तय होता है- उस फिल्म का आपके दिमाग पर इफ़ेक्ट और उस फिल्म की एनाटॉमी यानी उसके पुर्जे। 'धमाका' का असर लंबे वक्त तक आपकी मेमोरी में ताज़ा रहेगा।

    ये फ़िल्म एक न्यूज एंकर अर्जुन पाठक (कार्तिक) की कहानी से शुरू होती है, जो कभी प्राइम टाइम का चमकता चेहरा था लेकिन आज बड़े बेमन से अपने मीडिया हाउस के एक रेडियो चैनल पर ट्रैफिक का हालचाल बता रहा है। तभी उसे एक आदमी का कॉल आता है जिसका दावा है कि उसने मुंबई सी लिंक पर बम लगा दिए हैं। लाइव ब्लास्ट करके वो अपने इस दावे के सबूत भी देता है। ब्लास्ट रोकने का एक ही तरीका है कि उसकी शर्त मानी जाए। अर्जुन को अपनी खोई रेपुटेशन पाने का मौका मिलता है और वो इस कॉलर को ही अपनो डूबती नैया का मांझी बनाकर, किनारा लपकने का आईडिया लगा लेता है। यानी कि फिर से न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम पर सीट।

    मगर उसकी ये नाव किस सुनामी में जा फंसेगी ये उसने भी कभी सपने में नहीं सोचा होगा। उसकी बॉस (अमृता सुभाष) को एथिक्स-मोरैलिटी-और लोगों की जान का नुकसान जैसी चीजें न सुनाई देते हैं, न दिखाई। उसे बस एक ही शब्द सुनाई देता है- टीआरपी! अर्जुन की वाइफ सौम्या उसी चैनल में रिपोर्टर है लेकिन दोनों के रिश्ते में अब डिवोर्स वाला मोड़ आ चुका है। क्यों आया है? इसका लेना देना भी इस टीआरपी के खेल से ही है। 'धमाका' बेसिकली एक बहुत बारीकी से भरा मगर ग्रैंड तमाशा है, जिसका हीरो पुनीत शर्मा के साथ मिलकर डायरेक्टर राम माधवानी का लिखा बेहतरीन स्क्रीनप्ले है।

    'धमाका' आपको ज्ञान देने के लिए कहीं धीमी नहीं पड़ती, टीवी न्यूज देखते हुए जिस तरह आप एक एज पर रहते हैं, फ़िल्म आपको वैसे ही फंसाए रहती है। सारा ड्रामा अपनी स्पीड में चल रहा है, लगातार कुछ न कुछ होता चला जा रहा है। और दूसरी तरफ आप पूरे सेटअप से नफरत किए जा रहे हैं। आप न्यूज़ रूम का वो माहौल देखकर शॉक्ड रह जाते हैं कि अरे इत्तना नीचे कैसे जा सकता है कोई। और जब फाइनली इस तमाशे का पर्दा गिरता है तो आप सन्न रह जाते हैं। माधवानी मास्टर फ़िल्म मेकर्स में गिने जाते हैं और उन्होंने न्यूज़ रूम का बिजली भरा माहौल जिस तरह स्क्रीन पर उतारा है वो कमाल है। लेकिन उससे भी ज़्यादा बड़ी बात ये है कि उन्होंने 'धमाका' की ऐसी एंडिंग रखी।

    कार्तिक ने अर्जुन के कैरेक्टर के लिए एक न्यूज़ एंकर की बॉडी लैंग्वेज बहुत कस के पकड़ी है। हालांकि उनके बोलने के अंदाज़ में एंकर वाला हल्का सा कम लगा। लेकिन ओवरऑल इस रोल को उन्होंने बहुत ईमानदारी से प्ले किया है जो स्क्रीन पर दिखता है। अमृता सुभाष को जब आप 'गली बॉय' से याद करेंगे और फिर 'धमाका' में देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि धरती उलटना किसे कहते हैं। उनकी परफॉर्मेंस के बारे में तो मन कर रहा है जाने क्या क्या कह दूं, लेकिन एक लाइन पर्याप्त है- इस कहानी में वो हिटलर हैं। मृणाल ठाकुर का रोल बहुत लंबा नहीं है, लेकिन जितना है उतने में वो काम कर जाती हैं।

    कुल मिलाकर कार्तिक आर्यन का ये 'धमाका' ज़ोरदार है और दिमाग खोलकर देखेंगे तो आप को बहुत सवालों के साथ छोड़ जाएगा। ऐसा बताते हैं कि भगत सिंह ने कहा था- बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है। डायरेक्टर माधवानी का ये 'धमाका' असरदार तो डेफिनेटली है, लेकिन अब ये ऑडियंस पर भी है कि वो इसे सुन पाते हैं, या फिर न्यूज चैनल्स का शोर सुन-सुन कर कानों के पर्दे इतने पक्के हो चुके हैं कि अब उनमें कुछ और सुनने की गुंजाइश नहीं बची!


    Updated: November 19, 2021 06:21 PM IST
    About Author
    कंटेंट का बुखार हो या बॉक्स-ऑफिस की रफ़्तार... हमारे यहां फिल्मों की धार तसल्लीबख्श चेक की जाती है। शुक्रवार को मिलें, सिने-मा कसम.. देख लूंगा!